राम मंदिर विवाद: धार्मिक स्थलों पर VIP कल्चर और व्यवस्था पर उठते सवाल.
ओशो जब मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों और गिरिजाघरों के मठाधीशों के खिलाफ़ बोले थे, तो उनकी खूब आलोचना हुई थी. उनका घोर तिरस्कार हुआ था. लेकिन आज समझ आता है कि 6 दशक पहले भी वो सही कहते थे कि “ईश्वर से सीधा संवाद करो. सीधे जुड़ो. धर्म के नाम पर दुकानें चलाने वालों से दूर रहो.”
सच तो यह है कि ये लोग कतई धार्मिक नहीं हैं, ये विशुद्ध व्यापारी हैं. ये धर्म के ठेकेदार हैं, लेकिन धर्म से इनका कोई लेना-देना नहीं है.
राम मंदिर का लंबा संघर्ष और करोड़ों की चोरी
अयोध्या का राम मंदिर कोई साधारण मंदिर नहीं है. यह बरसों के संघर्षों, आंदोलनों और संकल्पों का परिणाम है. 22 जनवरी 2024 को जब अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा हुई थी, तो हज़ारों लोग वहां मौजूद थे. वहीं, 25-30 करोड़ लोग टीवी और दूसरे माध्यमों से इस ऐतिहासिक समारोह को देख रहे थे. अगले ही दिन 5 लाख लोग रामलला के दर्शन करने पहुंचे थे. जो लोग दूर से भी देख रहे थे, वे स्क्रीन पर अपने रामलला को देखकर भावुक हो रहे थे.
लेकिन इस ऐतिहासिक घटना के 2 साल बाद, आज जब देश और दुनिया भर के भक्त अपने रामलला के मंदिर में हुई करोड़ों रुपयों और गहनों की चोरी के बारे में जान रहे होंगे, तो उन पर क्या बीत रही होगी? आस्था के इस सबसे बड़े केंद्र में सेंधमारी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
VIP दर्शन और आम जनता का अपमान
मेरा दो बार मंदिर जाना हुआ. मैं उन भाग्यशाली लोगों में से हूं जिन्हें हर जगह VIP दर्शन मिल जाते हैं. लेकिन सच कहूं? चाहे अयोध्या का राम मंदिर हो, शिरडी का साईं बाबा मंदिर हो या फिर काशी विश्वनाथ… हर जगह VIP दर्शन करते हुए मुझे कहीं न कहीं ग्लानि ही महसूस होती है.
खासकर तब, जब मैं दूर-दराज से आए आम भक्तों को लंबी कतारों में खड़ा देखती हूं. सर्दी, गरमी, बरसात… कभी किसी नेता या अधिकारी की वजह से बैरीकेडिंग हो जाना, कभी पुलिस या मंदिर प्रशासन का खराब रवैया और धक्कामुक्की. ये सब कुछ झेलते हुए आम जनता सब्र से खड़ी रहती है. वे बस अपने प्रभु के दर्शन की राह देखते हैं.
आप किसी भी मंदिर में चले जाइए, वहां की देखरेख में लगे लोग भक्तों के साथ जैसा बर्ताव करते हैं, उसे देखकर दुख भी होता है और गुस्सा भी आता है. वह भक्त जो न जाने देश के किस कोने से आया है, जिसने घंटों इंतज़ार किया है… उसे भगवान की मूर्ति के सामने खड़े होने के लिए चंद सेकेंड भी नहीं मिलते कि मंदिर प्रशासन का कोई ठेकेदार आकर उसे धक्के मारकर आगे बढ़ा देता है.
सिर्फ़ मंदिर नहीं, हर धार्मिक स्थल की यही कहानी है
बात सिर्फ़ मंदिरों की नहीं है. आप अजमेर की दरगाह चले जाइए, तो वहां खादिमों का पूरा ध्यान सिर्फ़ इस बात पर रहता है कि आप गल्ले में पैसा कब डालेंगे और कितना डालेंगे. गुरुद्वारों का हाल भी कमोबेश ऐसा ही है. वहां महिलाओं का पल्लू सिर से हल्का-सा भी खिसक जाए, तो ढकने को लेकर इतनी बार और इतने बुरे ढंग से टोका जाता है कि आप गुरु का ध्यान तो क्या ही लगा पाएंगे! हर वक्त यही चिंता रहती है कि कहीं सिर का पल्लू न खिसक जाए. कभी-कभी सोचती हूं कि गुरु नानक आज होते, तो क्या वो सिर ढंकने को लेकर ऐसा रूखा बर्ताव करते?
मैं सालों से तिरुपति बालाजी जाना चाहती हूं, पर वहां की भयंकर भीड़, पैसे के हिसाब से VIP दर्शन तय होना, हर जगह से धकिया दिए जाने और पंडों के पैसे हड़पने के किस्से सुनकर ही मेरी हिम्मत जवाब दे देती है.
धर्म के ठेकेदारों की नज़र सिर्फ़ आपकी जेब पर है
दरअसल, इनमें से किसी को भी न ईश्वर से मतलब है, न धर्म से और न ही भक्तों से. इनको मतलब है सिर्फ़ और सिर्फ़ भक्तों की जेब से. जब कोई गरीब भक्त अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई का दस रुपया भी चढ़ाता है, या कोई साधन संपन्न भक्त अपने ईश्वर के श्रृंगार के लिए हीरे-जवाहरात लाता है, तो इनकी चोर निगाहें उसी चढ़ावे पर होती हैं.
बदलाव का समय: ख़त्म हो VIP कल्चर
मेरा मानना है कि अब हम सबको मिलकर इसे बदलना होगा. धार्मिक स्थलों पर VIP कल्चर पूरी तरह ख़त्म करना होगा. अगर दिल में सच्ची आस्था है, तो आप कितने ही बड़े VIP क्यों न हों, आपको एक लाइन में ही लगना चाहिए. ईश्वर के दरबार में सबको दर्शन के लिए समान अवसर मिलने चाहिए.
सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि धार्मिक स्थलों के इन ठेकेदारों की मनमानी, अहंकार और बदतमीज़ी पर लगाम लगे. पैसा हड़पने, भक्तों को डराने-धमकाने और बेवजह के कायदे-कानून झाड़ने पर पूरी तरह पाबंदी लगे.
ईश्वर के सेवक आज खुद को मालिक समझ बैठे हैं. वो भूल गए हैं कि उनका काम धार्मिक स्थल की व्यवस्था देखना था, जनता पर हुक्म चलाना नहीं. लेकिन जनता को यह दादागिरी अब लंबी नहीं चलने देनी चाहिए. अभी एक जगह का सच सामने आया है, हर जगह का सच सामने आना चाहिए. भक्तों को आवाज़ उठानी चाहिए. इन ठेकेदारों और व्यापारियों की दुकानें बंद होनी चाहिए, इससे पहले कि भक्त निराश होकर वहां जाना ही बंद कर दें.
राम तो हमारे भीतर हैं. हमें राम से जुड़ने के लिए किसी “ट्रस्ट” की ज़रूरत नहीं है. अयोध्या तो क्या… धरती के कण-कण में, और व्यक्ति के रोम-रोम में राम हैं