श्री रामरक्षा स्तोत्र की उत्पत्ति: एक करोड़ श्लोक और महादेव का स्वप्न
बचपन से ही मैंने देखा है कि हमारे घरों में ईश्वर स्मरण के कुछ नियम होते थे. जैसे प्रातः उठते ही धरती को नमन करते हुए अपनी हथेलियों को देखकर कहना “कराग्रे वस्ते लक्ष्मी” और अंत में पृथ्वी को नमन करते हुए धरती पर पैर रखना.
वैसे ही मुखमार्जन करने के बाद देवघर (अर्थात् वह कमरा जहां भगवान विराजित होते थे), वहां हाथ जोड़कर पहले गणेश जी को नमन कर कहना “वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभ:”. दिन की शुरुआत इस प्रकार करना और फिर स्नान इत्यादि से निवृत्त होने के बाद हनुमान चालीसा अथवा अन्य किसी स्तोत्र का पठन करना. यह नित्य नियम बच्चों को बचपन से सिखाए जाते थे जो जीवन शैली का हिस्सा थे.
यह रोज़ की आदतों में शामिल था, इसके लिए किसी विशेष प्रयत्न की आवश्यकता उस समय नहीं होती थी और न ही इससे किसी काम में रुकावट या देर होती थी.
मंत्रों का विज्ञान और नित्य नियम
यज्ञोपवीत होने के उपरांत लड़कों के लिए गायत्री मंत्र का पाठ अनिवार्य था और उसके लिए उन्हें समय निकालना आवश्यक था. इसी प्रकार संध्या समय देवघर में दीपक जलाकर “शुभंकरोति कल्याणम्” पढ़ना, यह भी दैनिक जीवन का हिस्सा था और स्वभाव वश आज भी है.
इसी के साथ श्री रामरक्षा स्तोत्र का पाठ भी सिखाया जाता था. श्री रामरक्षा स्तोत्र बुधकौशिक ऋषि द्वारा रचित है और कहा जाता है कि यह मनुष्य के लिए कवच का काम करता है. अतः इसका नित्य पठन करना अच्छा है.
वैसे भी संस्कृत के मंत्र कोई भी हों, वह नित्य नियम में इसीलिए रखे गए हैं क्योंकि यदि वह शुद्ध रूप से उच्चारित किए जाएं, तो उनके आघात बुद्धि को अधिक प्रखर बनाते हैं और इसका शरीर पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. यही कारण है कि शुद्ध मंत्रपठन करने वाले व्यक्ति में हमें एक स्वाभाविक ऊर्जा दिखाई देती है.
शरीर का कवच: श्री रामरक्षा स्तोत्र
अब रामरक्षा स्तोत्र एक मंत्र भी है और प्रभु राम की विशेषताएं बताने वाली एक स्तुति भी. साथ ही सिर से लेकर पैर तक हमारी रक्षा करने वाला एक कवच भी. “शिरो में राघव: पातु से लेकर पादौ विभीषण: पातु” तक.
यह स्तोत्र महादेव द्वारा बुधकौशिक ऋषि को स्वप्न में बताया गया और फिर उन्होंने स्वप्न में प्राप्त इसकी रचना हमारे लिए की. स्वप्न में इसे किस प्रकार महादेव द्वारा दिया गया, उसकी एक कथा बहुत ही अद्भुत और रोचक है.
महादेव, रामायण के एक करोड़ श्लोक और ‘राम’ नाम
ऋषि वाल्मीकि द्वारा रामायण की रचना की गई. उन्होंने इस रामकथा का इतना विस्तार किया कि वह एक करोड़ श्लोकों में पूर्ण हुआ. देव, मानव और दानव सभी इसे पाने को उत्सुक थे, परंतु इतना बड़ा ग्रंथ किसी एक को तो नहीं मिल सकता. फिर सभी ने महादेव से प्रार्थना की कि इसे किसे दिया जाए, इसका निर्णय आप करें.
महादेव ने कहा, “मैं तुम तीनों में इसे बराबर हिस्सों में बांट दूंगा, परंतु एक करोड़ श्लोकों में तीन हिस्से बराबर तो नहीं होंगे. अतः सभी बराबर बंट जाने के बाद जो बचेगा, उसे मैं रख लूंगा.”
यह बात तीनों को स्वीकार हुई और बंटवारा शुरू हो गया. सभी को बराबर-बराबर श्लोक बांट दिए गए. अंत में केवल दो अक्षर बचे, वह महादेव ने स्वतः के लिए रख लिए. वह दो अक्षर थे— ‘रा’ और ‘म’. महादेव इन्हीं दो शब्दों में ध्यानरत हो गए. बाकी सब अपने-अपने श्लोक लेकर चले गए. परंतु बुधकौशिक ऋषि ध्यानमग्न हो गए.
बुधकौशिक ऋषि का स्वप्न
बुधकौशिक ऋषि, कौशिक वंश के एक ऋषि थे. यह कौशिक वंश महर्षि विश्वामित्र का ही है. उन्हीं के वंश के बुधकौशिक ऋषि महादेव की उस सभा में ध्यानस्थ हो गए. अब महादेव उन्हें ध्यान से विरत भी करना नहीं चाहते थे. अतः उनकी ध्यानमग्न अवस्था में ही महादेव ने उन्हें यह रामरक्षा स्तोत्र की रचना प्रदान की.
यह प्राप्त करते ही उनका ध्यान भंग हुआ और इस रचना को उन्होंने मानव कल्याण के हितार्थ सार्वजनिक किया. इस प्रकार महादेव की कृपा से हमें श्री रामरक्षा स्तोत्र की प्राप्ति हुई.